शनि देव की कर्म फल प्रदाता कहा गया है| यह हमारे वर्तमान और पूर्व के कर्मो का लेखा जोखा करके कर्मानुसार फल प्रदान करते हैं| शनि की यह प्रक्रिया हमारी आत्मा को शुद्ध कर परमात्मा से मिलाने के लिए होती है|
शनि को सभी द्वादश राशियों में एक बार भ्रमण करने में 30 वर्ष का समय लगता है| अर्थात एक राशि में शनि देव ढाई वर्ष तक रहते हैं| जब शनि देव जातक के जन्म चन्द्रमा से द्वादश भाव में प्रवेश करते हैं तब जातक पर साढ़े साती का प्रभाव आरम्भ होता है| जब यह जातक की राशि से होते हुए द्वतीय भाव में विचरण करते हैं तो इस प्रकार तीन राशियों में कुल साढ़े सात वर्ष का काल साढ़े साती कहलाता है|
सामान्य अवस्था में यह जातक की जन्म राशि के द्वादश भाव से आरम्भ होकर द्वितीय भाव पर समाप्त होती है पर यदि अधिक विश्लेषण में जाएँ तो जन्म के चन्द्रमा के भोगांश ( डिग्री) से 45 अंश पूर्व से आरम्भ होकर 45 अंश पश्चात तक चलती है| इस अवस्था में यदि चन्द्रमा के भोगांश ( डिग्री) 15 अंश से कम है तो यह जातक के एकादश भाव के उत्तरार्ध (भोगांश अनुसार) से भी आरम्भ हो सकती है| इसी प्रकार यदि चन्द्रमा का भोगांश ( डिग्री) 15 अंश से अधिक है तो यह द्वादश भाव से आरम्भ तो होगी पर यह तृतीय भाव के पूर्वार्ध (भोगांश अनुसार) तक चल सकती है|
सामान्यतया शनि की साढ़े साती में जातक को विवाद, कलह, असंतोष, निराशा और विपरीत परिणामो का सामना करना पड़ता है| ऐसा माना जाता है की प्रथम ढाई वर्ष में शनि जातक को मानसिक रूप से परेशान करता है और दूसरे ढाई वर्ष में जातक को आर्थिक, शारीरिक और विश्वास रूप में परेशान करता है| तीसरे और अंतिम ढाई वर्ष में यह शनि देव पिछले पांच वर्ष में हुए नुकसान को सूद समेत भरपाई करते हैं| आम धारणा यह है की शनि अपनी साढ़े साती में जातक को कष्ट प्रदान करते हैं पर ऐसा सदैव नहीं होता है अपेक्षाकृत कुछ लोगों को शनि की साढ़े साती में बढ़कर लाभ, सम्मान और वैभव की प्राप्ति भी होती है| यदि जातक का चन्द्रमा उच्च राशि में हो या चन्द्रमा क्षीण न हो तो जातक की सहन शक्ति बढ़ जाती है और उसकी कार्य क्षमता बढ़ जाती है| ऐसा माना जाता है कि यदि लग्न वृषभ, मिथुन,कन्या,तुला मकर या कुम्भ हो तो जातक को शनि कि साढ़े साती कष्टकारी न होकर फलदायी होती है| वर्तमान में मकर, कुम्भ और मीन राशि के जातकों पर शनि के साढ़े साती चल रही है|
शनि को प्रसन्न करने के लिए किसी भी प्रकार के बुरे कर्मो से बचना चाहिए चाहे वो मन से हो, वचन से हो या कर्म से हो|
इसके अतिरिक्त शिव की उपासना करने वालों को इससे राहत मिलती है। साढ़े साती का प्रभाव होने पर नियमित रूप से शिवलिंग की पूजा करनी चाहिए।पीपल वृक्ष को शिव का रूप माना जाता है और इसमें सभी देवताओं का निवास मानते हैं इसलिए पीपल के पेड़ की तेल, तिल सहित विधि पूर्वक पूजा करने से मुक्ति मिलती है।शनि स्तोत्र का नियमित रुप से पाठ करें। इसके अलावा हनुमान जी को भी रुद्रावतार माना जाता है। उनकी आराधना भी इसके निवारण के लिए फ़लदायी होती है।